world family day

विश्व परिवार दिवस के अंतर्गत पंडित शंभूनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय शहडोल समाज कार्य विभाग प्रोफेसर नीलिमा खरे जी के मार्गदर्शन में अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस पर सामुहिक परिचर्चा की गई । परिचर्चा के दौरान इन मुख्य बिंदुओं को विशेष रूप से शामिल किया गया परिवार की अवधारणा और महत्त्व, बदलते समय में परिवार की संरचना, परिवार से जुड़ी समकालीन समस्याएँ, एकल एवं संयुक्त परिवार की वर्तमान स्थिति, सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका, सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं की भागीदारी, समाधान और सशक्तिकरण के उपाय आदि विषयों को शामिल करते हुए निष्कर्ष तक पहुंचाने का प्रयास विद्यार्थियों द्वारा किया गया। 
परिवार बिना जीवन संभव नहीं है। व्यक्ति को जीवन के हर पड़ाव पर परिवार की जरूरत होती है। ऐसे में परिवार के प्रति लोगों में चेतना लाने के लिए हर साल 15 मई को अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1994 में पहली बार अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया गया। इंटरनेशनल फैमिली डे की शुरुआत 1989 में हुई थी। इस दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में पहली बार परिवार के महत्व पर चर्चा की गई। 1993 में UNGA ने एक संकल्प में फैमिली डे के लिए 15 मई की तारीख तय की। 1994 को अंतरराष्ट्रीय परिवार वर्ष के रूप में घोषित किया था।
विश्व परिवार दिवस भारतीय संस्कृति में परिवार न केवल समाज की मौलिक ईकाई है बल्कि यह हमारी अहम पहचान भी है। राष्ट्र की प्रगति की मूल परिवार की उन्नति में समाया हुआ है। आजकल हर व्यक्ति मोबाइल या गैजेट्स में व्यस्त है। परिवार साथ होते हुए भी मानसिक रूप से दूर होते जा रहे हैं। इस दिवस के ज़रिए यह प्रयास किया जाता है कि तकनीक का इस्तेमाल रिश्तों को तोड़ने के बजाय जोड़ने के लिए हो। जैसे कि परिवारिक व्हाट्सएप ग्रुप्स, वीडियो कॉल्स, और डिजिटल फैमिली टाइम। परिवार दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अपने बुजुर्गों को उतना सम्मान और समय दे रहे हैं जितने के वे हकदार हैं? दादा-दादी, नाना-नानी का अनुभव, कहानियाँ और संस्कार किसी भी बच्चे के लिए अमूल्य होते हैं, जिन्हें संरक्षित रखना बेहद ज़रूरी है। 
आज समाज में परिवार का मतलब सिर्फ माँ-पिता और बच्चे नहीं रह गया है। सिंगल पैरेंट फैमिली, ग्रैंडपेरेंट्स केयर, दत्तक परिवार आदि भी समाज में स्वीकार्यता पा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस इन सभी परिवारिक संरचनाओं को समान महत्व देता है। भारतीय समाज में परिवार को हमेशा एक पवित्र संस्था के रूप में देखा गया है। यहाँ 'परिवार' केवल एक बंधन नहीं बल्कि धर्म, कर्तव्य और परंपरा है। संयुक्त परिवारों की परंपरा आज भी गाँवों और छोटे शहरों में जीवित है और यही हमारी सामाजिक जड़ों को मजबूती देती है विशिष्ट चर्चा की गई।
उस दौरान विजिटिंग फैकल्टी नितिन गर्ग, अर्पित दुबे एवं एम.एस.डब्लू द्वितीय सेमेस्टर एवं चतुर्थ सेमेस्टर के छात्र शिवम रजक, निधि सिंह, रेशमी नामदेव, कोमल द्विवेदी ,टीकबती बैगा ,भारती, किशन बैगा, पंकज सिंह आदि की सहभागिता रही।

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